
''पुस्तक चर्चा''
कोहनूर 90 साल तक ग्वालियर के तोमरवंशी राजाओं के पास था
सुभाष चंद्र अरोड़ा
संयुक्त संचालक , जनसंपर्क विभाग, म.प्र. शासन
| समय की रेत पर बनते बिगड़ते निशानों का लेखा-जोखा करते रहना हर समय जरूरी होता है । इस लेखे-जोखे के माध्यम से हम अपने अतीत को तो जानते ही हैं, अपने वर्तमान से निकलती भविष्य की राहें भी तय करते हैं और यह आशा करते हैं कि नये अनुभवों का एक विशिष्ट वातायन बनें । -मनोज श्रीवास्तव, आयुक्त,जनसंपर्क ... गोपाल गाथा एवं अंचल की सांस्कृतिक विरासतों, उनकी घ्वनियों को जागृत करती एक कथा है। आशा है आपको यह प्रयास सार्थक लगेगा । -डा. प्रकाश गौड़,अपर प्रंबध संचालक म.प्र.माध्यम |
| पुस्तक का नाम - गोपाचल गाथा लेखक- जगदीश तोमर मूल्य - 450/- रूपये प्रकाशक - जनसंपर्क विभाग मप्र |
'' सचमुच लेखक ने अपनी इस सारगर्भित पुस्तक में अंग्रेज पत्रकार एवं लेखक जेरी पिन्टो के व्हेरी स्पेशल ग्वालियर, मुगल सम्राट बाबर के हिन्दुस्तान के किलों का मोती 'ग्वालियर दुर्ग, साहित्य एवं संगीत के क्षेत्र में प्रतिभाओं को तराश कर तैयार करने वाले कोहनूर हीरे का मालिक तोमर राजवंश, जनमानस में रची बसी मृगनयनी और गन्ना बेगम, देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी और हिस्सेदार ग्वालियर, ग्वालियर की पत्रकारिता का इतिहास और ग्वालियर के इतिहास पुरूष राजा मानसिंह तोमर, श्रीमंत महादजी सिंधिया से लेकर कवि प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी तक सभी का शब्द चित्रात्मक शैली में पूरा खाका ही उतार दिया है , जिसे हर पाठक तन्मय होकर लगातार पढ़ता जावेगा । खासकर वह जो ग्वालियर को जानता है या फिर जानना चाहता है । लेखक ने शहर के गली और चौराहे भी अपनी कलम से नापते हुये चितेरा ओली (जहां बसते थे कलाकार) नगर में स्थापित अश्वारोही प्रतिमाएं और आदमकद प्रतिमाओं का लेखा जोखा भी पुस्तक में प्रस्तुत किया है ।
यहां पुस्तक से कुछ अंशो को उध्दृत किया जा रहा है जो 'गोपाचल गाथा' से पाठकों को पूरी खूबसूरती से परिचित कराते हुये ग्वालियर के गौरवशाली कल और आज से जोड़ देगा।
.........ग्वालियर किले का निर्माण तो बहुत बाद की बात है । किन्तु वह जिस पर्वत पर स्थित है उसका नाम गोपाचल या गोपागिरी है । इसके इस नाम से गोप-गोपिकाओं का सहज स्मरण हो आता है । गोपाचल से लगभग 30-32 किलोमीटर दूर उत्तरपूर्व की ओर एक कस्बा है-गोहद । इस नाम से यह ज्ञात होता है कि बृज भूमि की गायें संभवत: इस कस्बे तक चरने आती थी । यह बृज की गायों के आने की हद या अंतिम सीमा थी । ग्वालियर नाम से भी ग्वालों का बरबस स्मरण हो आता है । वस्तुत: यह सभी नाम - गोपाचल, गोहद और ग्वालियर इस क्षेत्र को बृजभूमि से जोड़ते हैं । यह तथ्य पुराग्रन्थों में भी प्रमाणित होते हैं । (पृ.स.10)
.........बस उस दिन से सूरज सेन ' राजा सूरज पाल ' हो गये और उन्होंने उस क्षेत्र में 'गोपाचल' पर एक किले का निर्माण प्रारंभ कर दिया । अब चूंकि जोगी महाराज का नाम ' ग्वाल्प' था इसलिये कालान्तर में गोपाचल के आस-पास जो नगर बसा वह सहज ही ग्वालियर कहलाया । यह बात 27 ई. की बताई जाती है। उस वर्ष से ग्वालियर में पालवंश का राज्य आरंभ हुआ । कहते हैं कि वह पाल राजा कच्छप या कुशवाह क्षत्रिय थे । उस वंश के 84 राजाओं ने 989 वर्ष तक ग्वालियर पर निर्बाध राज्य किया । (पृ.स. 19)
........किन्तु भारत के उत्तर पश्चिम से आने वाले आक्रान्ताओं ने जब जब दिल्ली पर अधिकार किया, तब-तब ग्वालियर को भी उन्होंने लूटा-खसोटा एवं विध्वंस का निशाना बनाया । किन्तु ग्वालियर था कि मिट-मिटकर भी विकास एवं वैभव के नये-नये सोपान चढ़ता गया । वह अनेक राजवंशो की राजधानी बना। इसके साथ संगीत, साहित्य और ललित कलाओं के समुन्नयन के लिये सुविख्यात भी हुआ । (पृ.स. 19-20)
........सातवीं-आठवीं शताब्दी में यहां संस्कृत के महान विद्वान एवं रचनाकार हुये । उनका नाम भवभूति था । उनके प्रेम प्रधान ' मालती माधव' में जिसमें देश काल का चित्रण है उससे इस क्षेत्र के भूगोल एवं प्रकृति का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है । उसका स्वर्णिम अतीत अब भग्नप्राय है। यहां अतीतकाल में निर्मित खुले रंगमंच के अवशेष, संस्कृत नाटकों के संतुलित मंचन की कथा कहते प्रतीत होते हैं । (पृ.स. 12)
........''कोहनूर दुनिया का सबसे कीमती हीरा है । कभी उसका वजन साढ़े तीन तोला था। किन्तु अब वह इंगलैंड में है और उसके दो टुकड़े हो चुके हैं ।'' उसकी कहानी भारत वर्ष से आरंभ होती है । वह ग्वालियर के तोमरवंशी राजाओं के पास लगभग 90 वर्ष रहा । '' (पृ.स. 96)
तिनके मानसिंघ भये भानि । ता सम भयौ न राज आनि ॥ (पृ 104)
........महाराजा मानसिंह तोमर 1486 में सिंहासन रूढ़ हुये । उनके पूर्व, उनके पूर्वज सात महाराजाओं ने ग्वालियर को पर्याप्त समृध्द और वैभवपूर्ण बना दिया था । यह राजवंश कोहनूर हीरे का स्वामी था । यह महामणि कितना कीमती था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके मूल्य से सारे संसार की आबादी को ढाई दिन तक भोजन कराया जा सकता था । वह हीरा महाराजा मानसिंह के प्रपितामह महाराज डूगेंन्द्र सिंह ने 1437 ई. में मालवा के सुल्तान होशंगशाह खिलजी से प्राप्त किया था । (पृ.स. 104)
........' उस लड़की का नाम था - मृगनयनी । गांव के लोग उसे निन्नी कहते थे । -- महाराज मानसिंह तो मृगनयनी में बल, वीरता और अनिद्य सौंदर्य का अनूठा संगम देखकर विस्मय विमुग्ध हो गये ।'' (पृ.स. 85)
........संगीत, साहित्य एवं स्थापत्य में महाराजा मानसिंह का योगदान वस्तुत: अभूतपूर्व रहा है। उनके द्वारा रचित'मानकुतूहल' संगीत सहित्य की अमूल्य निधि है। मुगल बादशाह औरंगजेब के समय कश्मीर का सूबेदार रहा फकीरूल्ला तो उक्त संगीत ग्रन्थ से इतना प्रभावित हुआ कि उसने इसका फारसी में अनुवाद किया और उसके माध्यम से 'मानकुतूहल' ईरान आदि देशों में पहुंचा तथा वहां के संगीताचार्यों में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ । (पृ.स. 10
........'' गुन्नी सिंह उर्फ गन्ना बेगम का नाम गन्ना बेगम इसलिये था क्यों कि उसकी आवाज में गन्ने की मिठास थी ।'' (पृ.स. 87 )
........महादजी स्वयं कवि थे । उन्होंने जाना कि गन्ना भी उच्चकोटि की शायरा और मधुर गायिका है । गन्ना ने महादजी सिंधिया के अनेक पदों को अपना स्वर दिया । उसके पास एक स्वर्णजड़ित तम्बूरा भी था । जब वह उसे बजाती और कोई गजल या महादजी द्वारा लिखित कोई पद गाती तो वातावरण रससिक्त हो जाता । महादजी मंत्रमुग्ध हो जाते । इस प्रकार गन्ना बेगम के जीवन में एक बार फिर सरसता प्रकट हुई किन्तु वह शायद अल्पकाल के लिये ही थी। (पृ.स. 91)
........कुछ तो हिन्दू संस्कार और कुछ राने खां की सेवा । शायद इन दोनों कारणों से महादजी भी धार्मिक उदारता के प्रेमी और पक्षधर बन गये । वह कृष्ण भक्त थे । किन्तु धार्मिक उदारता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुये उन्होंने श्रीकृष्ण का तकिया और गद्दा हरे रंग का रखा। उनके बाद सिंधिया नरेशों ने सूफी संतों सहित सभी मतपथों का समादर किया । 1886 से 1925 तक महाराजा रहे श्रीमंत माधवराव सिंधिया (माधौ महाराज) ने ग्वालियर में ताजियों के राजकीय सम्मान की प्रथा डाली। वह मुहर्रम के दिन हरे रंग के कपड़े पहनते तथा गोटे की माला लेकर फकीरी लेते थे । इतना ही नहीं वह सरकारी ताजिये को कन्धा देते और जोर से नारा लगाते ' बोल फकीरी-या इमाम।' (पृ.स. 101)
........उन दिनों ग्वालियर एक देशी रियासत था । इसलिये वहां बीसवीं सदी के आरंभ-आरंभ तक कोई राजनीतिक सक्रियता नहीं थी । किन्तु धीरे-धीरे, देश के अन्य प्रदेशों जहां सीधे-सीधे अंग्रेजों का ही शासन था- की खबरें भी रियासत में पहुंचने लगी । लोकमान्य तिलक के पत्र ' मराठा' तथा 'केसरी0 Comment(s) / Post Comment
बी.एस.एन.एल. मुरैना आखिर कहॉं गईं चोरी गई हजारों मीटर केबिलें
किस्सा ए बी.एस.एन.एल.भ्रष्टाचार बनाम अंधेरगर्दी विद गुण्डागर्दी
किश्तबद्ध रिपोर्ताज भाग- 5
मुरैना 4 दिसम्बर 2007 । भ्रष्टाचार संचार निगम अनलिमिटेड यानि बी.एस.एन.एल. की पिछली किश्तों में अब तक आप पढ़ चुके हैं कि बी.एस.एन.एल. ने किस तरह अपनी सेवाओं और उपभोक्ताओं को प्रायवेट कम्पनीयों को सामने परोसा अब सवाल ये है कि भला कोई क्यों अपने ग्राहकों यानि उपभोक्ताओं को दूसरों को सौंपेगा । इस सवाल का जवाब भी बड़ा दिलचस्प है, बी.एस.एन.एल. से तो उनको तयशुदा तनख्वाह मिलती ही है, ऊपर से इस भ्रष्टाचार संचार निगम अनलिमिटेड में दो नंबर की मोटी कमाई के भी अनेक जरिये हैं, फर्जी बिलिंग (सबूत हमारे पास हैं) से लेकर खरीद फरोख्त और ठेकों में जबरदस्त भ्रष्टाचार (सबूत हमारे पास हैं), बी.एस.एन.एल. की योजनाओं उपहारों में जबरदस्त भ्रष्टाचार व अंधेरगर्दी (सबूत हमारे पास हैं) के अलावा म.प्र. की बिजली चोरी और उसका अवैध पुन: विक्रय, प्रायवेट कम्पनीयों से करोड़ों और लाखों की रिश्वत वसूल कर उसके एवज में उपभोक्ता ट्रान्सफर करना आदि आदि आप आगे पढ़ते जाईये सब पता चलता जायेगा । इसके अलावा इस उपभोक्ता के बिल को उस उपभोक्ता के बिल में घुसेड़ना, सेटिंग के जरिये आप फ्री में लाखों करोड़ों रूपये की बात विदेशों तक में फ्री में कर सकते हैं, और इन बिलों की टोपी अन्य उपभोक्ताओं के सिर चढ़ाई जाती है, यदि कोई उपभोक्ता भूले भटके शिकायत शिकवा करे या अपनी शिकायत ऊपर भोपाल और दिल्ली तक करे तो अव्वल तो उसकी शिकायत पर कोई कार्यवाही भोपाल से दिल्ली तक नहीं होगी और उस उपभोक्ता पर फर्जी बिलिंग कर उसका खाता इतना लम्बा चौड़ा कर दिया जायेगा कि उसे चोर और डिफाल्टर घोषित करके फाइल नस्तीबद्ध स्वत: ही होती रहेगी । और उसकी कोई सुनवाई नहीं होगी । हमारे पास फर्जी बिलिंग के पक्के और मुकम्मल सबूत मौजूद है जो कि आगे की किश्तों में स्वत: जिक्र में आयेंगें (वर्तमान में ये आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने हेतु साक्ष्य हैं और आपराधिक प्रकरण पुलिस व न्यायालय कार्यवाही प्रक्रम में है)
मजे की बात ये है कि बी.एस.एन.एल. में होने वाले विभिन्न भ्रष्टाचारों और धांधलीयों की कोई शिकायत न होती हो, ऐसा नहीं हैं, हमारे पास अब तक हुयी शिकायतों और सबूतों का जखीरा है, किन्तु इस भ्रष्टाचार के बंटवारे की लम्बी चौड़ी रकम का बड़ा हिस्सा दिल्ली और भोपाल तक पहुँचता है, अगली किश्तों में यह जिक्र भी आयेगा कि फर्जी बिलिंग और हड़का कर जबरन उपभोक्ताओं से अनुचित व अवैध रकम वसूली, उददापन कृत्य और गुण्डागर्दी, फर्जी व कूटरचित साक्ष्यों के सहारे उपभोक्ताओं पर मुकदमे बाजी कर करोड़ों बटोरने वाले बी.एस.एन.एल. का यह पैसा आखिर कहॉं हिल्ले लग रहा है, आप जब ये रहस्य जानेंगें तो खुद ही उछल पड़ेंगें ।
मुरैना बी.एस.एन.एल. प्रक्षेत्र में वर्ष 2003 से 2007 तक हजारों मीटर अण्डरग्राउण्ड ओ.एफ.सी. केबल चोरी हो चुकी है, और इसके चलते उपभोक्ताओं के टेलीफोन और इण्टरनेट कई दिनों तक अनेकों बार ठप्प रहे । यह सारे शहर मुरैना को मालुम है और अखबारों में भी जम कर ये खबरें छपीं हैं । हमारे पास कुछ अतिरिक्त साक्ष्य भी है ।
केबल चोरी होना यूं तो देखने में ओर सुनने में सामान्य चोरी की घटना जान पड़ती है, मगर हकीकत कुछ हट कर और कुछ अलग ही कहानी बयां करती है ।
पिछले सालों में चोरी गई केबिलें आज तक नहीं मिलीं, तो आखिर कहॉं गईं, जमीन खा गई या आसमान लील गया, क्यों कहीं भी बरामद न हो सकी ये केबलें । हॉं जी यही सच है, इन चोरी की केबलों को वाकई जमीन लील गयी । ये केबलें आम आदमी और आम चोरों के मतलब की नहीं होतीं, और न इनका उसके लिये कोई आम इस्तेमाल है । मगर इन केबलों की कीमत लाखों और करोड़ों रूपयों में अवश्य होती है । अब तो आप समझ ही गये होंगें कि किसने चुराईं केबलें और कहॉं गई ये केबलें ।
अब भी नहीं समझे तो चलो इस पहेली को भी हल कर देते हैं । यह केबलें केवल प्रायवेट कम्पनी वाले फ्रेन्चाइजी सेठजी के लिये यूजफुल और आज भी जमीन में उनकी नेटवर्क के परिपथ यानि सर्किट में फंसी है, फ्रेन्चाइजी सेठजी के तो बारे न्यारे हैं, कुछ दान दहेज में मिल गयीं और कुछ चोरी करवा लीं (इस चोरी में बी.एस.एन.एल. वाले ही आपराधिक षडयंत्र रचकर भागीदार हैं – देखें धारा 120 बी भा.द.वि.) केबलों के सारे राज आज भी जमीन में दफन हैं । अब ये तो राम जाने कि बी.एस.एन.एल. वाले सेठ जी और प्रयवेट कम्पनी वाले सेठजी में आपस में क्या गुण्ताड़ा है, मगर बी.एस.एन.एल. उनका अन्धा सेवक है यह तो सिद्ध है ।
बी.एस.एन.एल. के उपभोक्ता पिछले दस साल में विशेषकर पिछले पॉंच साल में यूं ही प्रायवेट कम्पनीयों पर ट्रान्सफर नहीं हो गये बल्कि एक बड़ा गंभीर और तिलस्मी खेल खेला गया ।
क्रमश: जारी अगले अंक में .........